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Sunday, September 28, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता — तृतीय अध्याय (कर्मयोगः) संस्कृत श्लोकों के साथ सरल हिन्दी भावार्थ

श्रीमद्भगवद्गीता — तृतीय अध्याय (कर्मयोगः) संस्कृत श्लोकों के साथ सरल हिन्दी भावार्थ 
श्रीमद्भगवद्गीता

तृतीयोऽध्यायः — कर्मयोगः

अर्जुन उवाच

(श्लोक 3.1–3.2)
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥

हिन्दी भावार्थ:
अर्जुन बोले – हे जनार्दन! यदि आपके विचार से ज्ञानकर्म (ज्ञानयोग) कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर मुझे भयानक युद्ध में क्यों लगाते हैं? आप मिश्रित वचनों से मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। कृपा कर एक निश्चित मार्ग बताइये जिससे मुझे कल्याण मिले।

श्रीभगवानुवाच

(श्लोक 3.3–3.5)
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

हिन्दी भावार्थ:
भगवान बोले – हे अर्जुन! संसार में पहले दो प्रकार की साधना का उपदेश मैंने दिया है – सांख्ययोगियों के लिए ज्ञानयोग और कर्मयोगियों के लिए कर्मयोग।
मनुष्य कर्म का आरम्भ न करने से निष्क्रियता (मोक्ष) को प्राप्त नहीं करता और केवल संन्यास लेने से सिद्धि नहीं मिलती।
क्योंकि कोई भी व्यक्ति क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; सब लोग प्रकृति के गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करने को बाध्य हैं।

कर्म और यज्ञ का महत्व

(श्लोक 3.8–3.9)
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥

हिन्दी भावार्थ:
हे अर्जुन! अपने नियत कर्म को अवश्य करो, क्योंकि कर्म न करने से श्रेष्ठ है। बिना कर्म के तो तुम्हारी शरीर यात्रा भी नहीं चल सकती।
यह संसार यज्ञार्थ (ईश्वर हेतु) किए गए कर्म को छोड़कर और सब कर्मों से बंधन में डालता है। इसलिए तुम आसक्ति रहित होकर यज्ञ के लिए ही कर्म करो।

जीवनचक्र और कर्तव्य

(श्लोक 3.14–3.16)
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥

हिन्दी भावार्थ:
सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
कर्म वेद से उत्पन्न है और वेद अक्षर (परमात्मा) से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म नित्य ही यज्ञ में स्थित है।

आदर्श और लोकसंग्रह

(श्लोक 3.20–3.21)
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

हिन्दी भावार्थ:
जनक आदि राजाओं ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। इसलिए लोकसंग्रह (लोगों को सही मार्ग पर बनाए रखने) के लिए तुम्हें भी कर्म करना चाहिए।
क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी उसका अनुसरण करते हैं। वह जो प्रमाण प्रस्तुत करता है, लोग उसी का अनुसरण करते हैं।

अर्जुन का प्रश्न और भगवान का उत्तर

(श्लोक 3.36–3.37)
अर्जुन उवाच —
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥

श्रीभगवानुवाच —
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

हिन्दी भावार्थ:
अर्जुन ने पूछा – हे कृष्ण! मनुष्य अनिच्छा होते हुए भी किस बलात् प्रवृत्ति से पाप करता है?
भगवान ने कहा – वह बल काम (वासना) और क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह महापापी और महाभक्षक है, इसे ही यहाँ शत्रु जानो।

अन्तिम उपदेश

(श्लोक 3.42–3.43)
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥

हिन्दी भावार्थ:
इन्द्रियों को लोग श्रेष्ठ कहते हैं, इन्द्रियों से भी श्रेष्ठ मन है, मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है और बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है।
इस प्रकार आत्मा को बुद्धि से परे समझकर, अपने आप को स्थिर करके, हे अर्जुन! उस कठिन शत्रु (वासना रूपी काम) का नाश करो।

इस प्रकार तृतीय अध्याय कर्मयोग का संस्कृत श्लोक और हिन्दी भावार्थ दोनों पूरे हुए।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इसे YouTube चैनल प्रस्तुति के लिए स्क्रिप्ट की तरह (शीर्षक, अध्याय नाम, श्लोक–भावार्थ, बीच में नैरेशन के सुझाव) तैयार कर दूँ, ताकि सीधे वीडियो बनाने में आसानी हो?

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