मंगलाचरण
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन
हरण भवभय दारुणम् ।
नवकंज-लोचन कंज-मुख
कर-कंज-पद-कंजारुणम् ॥
हनुमानजी का समुद्र लांघना
जटायुधारी अति बलवाना,
नाम जपे “जय श्रीरामना”।
एके बानर भीम बलेशा,
लांघि चले सागर सुरेशा।
“राम काज करिबे को आतुर,
छलांग लगाई गगन विचरत।”
लंका में प्रवेश
रात अंधेरी चंद्र प्रकाशा,
लंका नगरी दिव्य तमाशा।
रूप बदल हनुमान सियाना,
ढूँढत फिरें जनकसुता राना।
भय न कछु मन में उठत,
राम नाम मनोबल बढ़त।
अशोक वाटिका में सीता माता का दर्शन
देखी जनकदुलारी रोती,
रावण की लंका में होती।
विनम्र हनू बोले दबि स्वर,
“मातु! रामदूत मैं निर्भय कर।”
राम मुद्रिका देखत सीता,
आँखिन भरि आई प्रीता।
बोलीं— “कुशल कहो प्रभु केसा?”
हनू बोले— “राम सन्देशा।”
लंका दहन
असुर निकर सब आये घेरा,
बनर वीर ने खेल घनेरा।
बद्ध किये जब ब्रह्म पाश में,
हँसे हनू मन की हाश में।
पूँछ बढ़ाई, नगर जलाया,
लंका का हर महल दहाया।
नाम जपत जब राम रघुवीरा,
पथ दिखाए सागर तट तीरा।
वापसी और जयघोष
राम काज सफल भये नाथा,
दूत चला वापस प्रभु पासा।
लाये समाचार मातु सुहाई,
राम लखन सुन बहुत सहाई।
भरि आनंद भयो सब टोळी,
राम हृदय हनू की बोली—
“दूत हूँ प्रभु का बल अपारा,
काटत सकल संकट तुम्हारा।”
समापन चौपाई
पवनसुत बजन करै जो कोई,
संकट काटे तिनका सोई।
रामहिं भजै सोई सुखु पावै,
भव-भय, रोग, दुःख सब जावै।
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जय श्रीराम
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